Thursday, January 31, 2013

*गुफ्तुगू*



अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,

हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,

अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,

फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,

यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,

खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,

अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,

कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,

अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।
मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,

हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,

हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,

अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,

मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,

जिंदगी कई बार हमें अंधेरे में लाके छोड़ देती है |




जिंदगी कई बार हमें अंधेरे में लाके छोड़ देती है |
दर्द में बेहाल बेबस छोड़ देती है
ना मैं नज़र आता हूँ ना रास्ता नजर आता है
दूर तक बस अँधेरा नज़र आता है
तड़पता हूँ रोता हूँ
झड़ता हूँ बिगड़ता हूँ
फ़िर लाचार सा गिर जाता हूँ
ठोकरों के शहर में बिना मरहम दिल तोड देती हैं
जिंदगी कई बार अंधेरे में लाके छोड़ देती है


सोच के कुछ घोडे दौड़ने लगते है
छुटे साथी , जी को झंक्झोरने लगते है
फ़िर अचनाक से एक हीरा चमकता है
अंधेरे में रोशन सा नज़र आता है
उसे पाके मैं मचल पड़ता हूँ
उसी अंधेरे में चल पड़ता हूँ
रोशनी मिलती है हौसला मिलता है
रास्ता जैसे कदमो के साथ चलता है
बदलता कुछ नही पर सब कुछ बदलता है
जानते है वो हीरा कौन है ?

वो हीरा मैं हूँ और वो अँधेरा कोयले की खान है
जिंदगी बस कुछ देर मुझे मेरे साथ अकेला छोड़ देती है |

Friday, January 18, 2013

शाम ढले





           
ये धूप किनारा शाम ढले
मिलते हैं दोंनो वक्त जहाँ
जो रात न दिन, जो आज न कल
पल भर में अमर, पल भर में धुंआँ
इस धूप किनारे, पल दो पल
होठों की लपक, बाँहों की खनक
ये मेल हमारा झूठ न सच
क्यों रार करें, क्यों दोष धरें
किस कारण झूठी बात करें
जब तेरी समन्दर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोयेंगे घर-दर वाले
और राही अपनी राह लेगा !





बिखर जाता हूँ





नक्श-ए-इमरोज* से आगे जब निगाह दौड़ाता हूँ,
खुद को फैला हर जगह और खुद में सिमटा हुआ पाता हूँ ।
जब कभी आज के हालात पर निगाह उठाता हूँ,
खुद को तन्हा दूर बहुत दूर तलक पाता हूँ ।
और जब अतीत के दरवाजे से गुजर आता हूँ,
खुद के टुकड़े जोड़कर कागज़ पे बिखर जाता हूँ…।

राघवेन्द्र सरसैया